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Wednesday, 5 May 2021

ऐ मूरत! तुझे बदलने की है ना ज़रूरत (जन्मदिन पर एक कविता) - PRAKASH SAH

आज 5 मई है और मैं आपसब को बताना चाहता हूँ कि आज मेरे दोस्त OMKAR NARAYAN SINGH का जन्मदिन है। उसके साथ मेरा मित्रता से अधिक भ्रातृत्व की आत्मीयता है। हम एक दूसरे को भाई कहकर ही संबोधन करते है। पर ऐसा कोई दिन नहीं है जब हमदोनो के बीच थोड़ा-बहुत नोकझोंक ना हो......लेकिन हमदोनो कभी भी इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। मेरा मानना है  कि बिती बात पर ज़्यादा चर्चा नहीं होनी चाहिए......स्पष्टीकरण के लिए तो बिल्कुल नहीं। वैसे अधिकतम समय हमारा बहस-नोकझोंक किसी सार्थक विषय पर ही होता है।

यह कविता उसी के लिए है। वैसे इस कविता को तो मैंने बहुत पहले लिखा था....पर कभी भी किसी के साथ साझा नहीं किया था....ना ही  किसी जगह छापा था। आज पहला अवसर है जो आप सभी के साथ इसे साझा कर रहा हूँ। मुझे पता है उसे बहुत अच्छा लगेगा।

इस कविता की एक पंक्ति में एक शब्द है...."प्राणों"। इसे अंग्रेजी के अक्षरों में लिखा जाए तो इस प्रकार है....PRAANO (प्राणों)........यह हम पाँच दोस्तों के नाम के शुरू का अक्षर है।


www.prkshsah2011.blogspot.in


वो कागज़ ना होगा आम,

जिस कोरे कागज़ पे लिख दूँ  तेरा नाम।

चूरा लाऊँ हर एक वो शाम,

जिससे करूँ तेरी गुण-गान।

 

तू ना है गुमनाम,

तू तो है ‘प्राणों का प्राण’।

बना दूँ तेरी एक मूरत,

हूबहू हो तेरी ही सूरत।

 

एक ख़ासीयत पत्थर की मूरत में होती है,

सालों-साल ना वो बदलती है,

घीस जाती है, गिर कर टूट जाती है,

पर दूसरों की चाह में ना पड़ कर,

कभी ना खुद को बदलती है।

 

पत्थर को तराशकर ही बनते हैं मूरत,

ऐ मूरत ! तुझे बदलने की है ना ज़रूरत।

तू जैसा है वैसा ही रह,

कर सभी के आशाओं का सम्मान।

 

अगर करे कोई तेरा अपमान,

तो बन जा फिर से पत्थर की मूरत,

ऐ मूरत ! तुझे बदलने की है ना ज़रूरत.....

                                               -प्रकाश साह


 



 मेरी कुछ अन्य रचनाएँ....



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🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏

Monday, 3 May 2021

यूँ ही कब तक अकेले मचलते रहेंगे | Quarantine | कोरोना, शहर और मेरी मोहब्बत | -PRAKASH SAH

 

पीछले एक साल के अनुभवों को अगर हम छोड़ दें तो इस QUARANTINE शब्द से हम ना के बराबर से वाकिफ थे.....मैं तो बिल्कुल वाकिफ नहीं था। QUARANTINE शब्द का शाब्दिक अर्थ यह है कि एक निश्चित दायरे में बंद रहना है.......हाँ, मैं इसे बंद रहना ही कहूँगा क्योंकि वर्तमान परिस्थिति में यह हमारे इच्छा के अनूकुल नहीं है।

यह सिर्फ कुछ दिनों की बात नहीं थी.......यह कई महिनों चला। ना हम अपने किसी मित्र, रिश्तेदार से मिल पा रहे थे और ना ही किसी अन्य परिचित व्यक्ति से।............उनका हाल केवल फोन से ही पता चल पा रहा था। कभी-कभी तो उस वक्त अकेलापन भी महसूस होने लगता था।

अब तो कोरोना की दूसरी लहर भी आ चुकी है और इसका प्रकोप भी लगातार ज़ारी है...तो इस अनुसार अभी की स्थिति में भी कुछ ज़्यादा बदलाव नहीं आया है........बल्की बहुत दयनीय स्थिति है। अब फिर लोग अपनों से मिल नहीं पा रहे हैं....और अगर कोई मिल भी रहा है तो बहुत हिचक-हिचक के मिल रहे हैं। यह ऐसी महामारी आयी है जो हमें अपनों के बीच में ही शंका पैदा कर दे रही है कि कहीं उनसे हमें यह बिमारी ना हो जाए। यह सही भी है।

जैसा कि हम हमेशा सुनते आये है कि किसी भी दुःख, दर्द, बिमारी में अपनों के बीच में रहने से वह मुश्किल समय जल्दी गुजर जाता है...........पर अभी अगर किन्हीं को कोरोना हो जा रहा है तो उन्हें अपने समिप रख के उनका ख़्याल रखने में बहुत परेशानी आ रही है। और हम वर्तमान परिस्थिति के अनुसार उनको एक बंद कमरे में QUARANTINE होने को कह दे रहे हैं.....और यह सही भी है।

इस तरह उस वक्त उनकी क्या मनःस्थिति होगी और वो किन-किन ख़्यालों से गुज़र रहे होंगे...य़ह विस्तृत ढ़ंग से बताना आसान नहीं है।

चलिए फिर भी अगर इस दौरान जब एक पति, अपनी पत्नि को, अपना हाल बताता है तो क्या कहता है?.....इसपर मैंने उन भावों को कुछ पंक्तियों में लिखने का प्रयास किया है....


UNPREDICTABLE ANGRY BOY - www.prkshsah2011.blogspot.in

 


 यूँ ही कब तक अकेले मचलते रहेंगे 

 

ख़ामोशी है चारो तरफ,

बेहोशी में जी रहे हैं सब।

 

कब तक, यूँ ही

हाथों को साफ करते रहेंगे!

अब मेरे होंठ, तुम्हारे हाथों को

चूमने के लिए मचल रहे हैं।

ये हाथ, कब तक, यूँ ही

अकेले मचलते रहेंगे।

 

वो पिछली यादें,

सारी की सारी, धुँधली हो चुकी हैं,

जो तुम्हारी बाँहों की गर्मी,

मुझे कई दिनों की

सुकून की नींद दी थी।

अब हम अकेले, कब तक, यूँ ही

करवटें बदलते-टूटते रहेंगे।

 

हम पास आयें,

इसका बेसब्री से इंतज़ार है।

हाँ, ऐसे बिछड़े, कब तक रहेंगे!

ये दूरी, अब ना सही जा रही है।

हम, कब तक , यूँ ही

अकेले परेशान होते रहेंगे!!!

 

ख़ामोशी है चारो तरफ,

बेहोशी में जी रहे हैं सब...

                 -प्रकाश साह

                                  140421



 मेरी कुछ अन्य रचनाएँ....




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🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏

Saturday, 24 April 2021

बुरा नहीं हूँ मैं - Prakash Sah | Pooja Pandey

मैं आप सभी को बता दूँ इस रचना के आरंभ की चार पंक्तियाँ POOJA PANDEY JI द्वारा लिखी हुई है। मैंने जब इन चार पंक्तियों को पढ़ा तो स्तब्ध रह गया। मैं भी खुद को रोक ना पाया और इसके बाद की चार पंक्तियां मैंने लिख कर Pooja Ji को भेजा। उन्होंने मेरी पंक्तियों की सराहना की।

Pooja Pandey जी की लिखी वो चार पंक्तियाँ...

"......

बुरा नहीं हूँ मैं

मेरी भी कुछ कहानी है

टूट चुका हूँ मैं

अपनों की मेहरबानी है

                ........"


फिर मैंने उनको सलाह दिया कि आप इसके आगे और लिखिए क्योंकि आपने आरंभ बहुत अच्छा किया है........और साथ में मैंने यह भी कहा कि शुरू की पंक्तियां अगर मेरी होती तो फिर मैं इसके आगे की कुछ और पंक्तियाँ भी जरूर लिखता।

ज़वाब में उन्होंने मुझे कहा कि "आप लिखिए...मुझे कोई परेशानी नहीं होगी अगर आप लिखोगे तो।" अब उन्होंने मुझे #इजाजत दे दी।

मैंने इन शुरू के चार पंक्तियाों को थोड़ा अपना मानकर लिखना शुरू कर दिया। यह POOJA ji की ही मेहरबानी है जो मैं नीचे लिखे हुये पंक्तियों को लिखने में सफल रहा।

उनका बहुत-बहुत धन्यवाद, जो उन्होंने मुझे अपनी पंक्तियों से लिखने की #प्रेरणा दीं। बहुत-बहुत आभार।

_______________


●○●○●

मैंने उनसे एक और इज़ाज़त माँगी  कि आप मुझे  इसे मेरे BLOG पर छापने की इज़ाज़त दीजिए। उन्हाेंने मुझे बहुत ही सहजता से इसकी इज़ाज़त दे दीं। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि यह रचना आपने रचा है और इतनी बेहतरीन रचना के लिए आप ही सराहना के हकदार हैं।......पर मेरा मानना है कि वो भी बराबर की सराहना की हकदार हैं।

तो आज उनकी इज़ाज़त से मैं आपसब को पूरी रचना पढ़ने का अवसर दे रहा हूँ। चलिए अब पढ़ते है इस रचना को....

UNPREDICTABLE ANGRY BOY - www.prkshsah2011.blogspot.in

        ...

बुरा नहीं हूँ मैं

मेरी भी कुछ कहानी है

टूट चुका हूँ मैं

अपनों की मेहरबानी है


रोया नहीं हूँ मैं

मेरी कुछ यादें पुरानी है 

भूल चुका हूँ मैं

बस वो रिश्तें गँवानी है


झूका नहीं हूँ मैं

मेरी भी कुछ मज़बूरी है

भटक चुका हूँ मैं

ये ज़िंदगी भी ज़रूरी है


अंजाना नहीं हूँ मैं

मेरी कुछ बातें संजीवनी है

आज़मा चुका हूँ मैं

उन में क्या-क्या बिमारी है 

        -प्रकाश साह | पूजा पाण्डेय

                 240421


 मेरी कुछ अन्य रचनाएँ....




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Friday, 23 April 2021

कोरोना से एकतरफा संवाद - Prakash Sah (काेराेना, शहर और मेरी मोहब्बत ❤️)


UNPREDICTABLE ANGRY BOY - www.prkshsah2011.blogspot.in


तुम्हें,  हम  भूल  गयें,  ऐसा  अभी  हम  कहने  वाले  ही थे

श्मशान में भीड़ है,  अरे! हम अख़बार में ये क्या पढ़ रहे हैं


जब  चुनाव  था,  शायद  तुम्हें  रिश्वत  से  भगाया  गया  था

तुम्हें उकसाया जा रहा, शायद वैक्सीन के दलाल कूद पड़े हैं


हम  एक  कमरे  में  बंद  सिर्फ  तुम्हें  ही  लिखे  जा  रहे हैं

वो  तुम्हीं  वज़ह हो  कि शहर-के-शहर  बंद  किए जा रहे हैं


जब  तुम  छूप-छूप  के  देखती  हो,  किसी  सांसों  के  सहारे

केवल  हम ही  नहीं,  सब  मुँह  छुपाए  तुमसे  भागे जा रहे हैं


तुम्हें,  हम  भूल  गयें,  ऐसा  अभी  हम  कहने  वाले  ही थे...

                                                                -प्रकाश साह
                                                                                                                                                                                          230421


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