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Monday, 12 August 2024

उम्र से पहले | PRAKASH SAH

 

PC : @prakashsah


मुमकिन नहीं तुम्हारा मेरा होना,

यूँ ही उम्र को पहले मैंने बुलाया नहीं।


सच है कि यूँ ही कोई

'उम्र' को पहले बुलाया नहीं करता,

बेवक्त घर में उन्हें अचानक

छोटा से बड़ा होना जाना पड़ता होगा।

-प्रकाश साह
29062024



 कुछ अन्य नयी रचनाएँ....



🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏

Tuesday, 26 November 2019

फ़क़ीर हूँ (Fakir hunh)........-prakash sah


फ़क़ीर हूँ - FAKIR HUNH - Prakash sah - UNPREDICTABLE ANGRY BOY -  www.prkshsah2011.blogspot.in


  
मेरे लिए...
   आरंभ क्या! अंत क्या!
   अंत ही आरंभ है,
   आरंभ का ही अंत है।
   मैं ही आरंभ करूँ, मैं ही अंत करूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
        सब ‘शून्य’ है।
हाँ मैं...
     शून्य हूँ...!!        फ़कीर हूँ...!!
     फ़कीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   जन्म क्या! मृत्यु क्या!
   जन्म ही परमात्मा हैं,
   मृत्यु ही परमात्मा हैं।
   मैं लिन हूँ, मैं विलिन हूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
         सब ‘अक्षुण्ण’ है।
हाँ मैं...
     अक्षुण्ण हूँ...!!    फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   उजाला क्या! अंधेरा क्या!
   दीये का ही जला हूँ,
   दीये के ही तले हूँ।
   मैं ही अकेला हूँ, मैं ही बाती हूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
         सब ‘पूर्ण’ है।
हाँ मैं...
     पूर्ण हूँ...!!         फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   अपना क्या! पराया क्या!
   दुनिया ही अपना है,
   पराया कोई जन नहीँ।
   मैं ही पास दिखूं, मैं ही दूर दिखूं।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
         सब ‘एकात्म’ है।
हाँ मैं...
     एकात्म हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   कम क्या! ज्यादा क्या!
   कम ही ज्यादा है,
   ज्यादा से ही दूरी है।
   मैं अर्पित हूँ, मैं समर्पित हूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक 'फ़क़ीर' हूँ।
मेरे लिए...
         सब ‘क्षणिक’ है।
हाँ मैं...
     क्षणिक हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   अमीरी क्या! गरीबी क्या!
   स्वयं ही गरीबी ओढ़ी,
   स्वयं ही अमीरी छोड़ी।
   मैं ही कारण हूँ, मैं ही साधारण हूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
                                      सब ‘विचार’ है।
हाँ मैं...
     विचार हूँ....!!     फ़क़ीर हूँ...!!
                                  फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   घर क्या! वन क्या!
   वन में ही जीवन है,
   स्वयं के ही खोज में।
   मैं ही भ्रमण करूँ, मैं ही भजन करूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
         सब ‘अनिश्चित’ है।
हाँ मैं...
     अनिश्चित हूँ...!!  फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   न्याय क्या! नियम क्या!
   स्वभाव ही नियम है,
   बदलाव ही न्याय है।
   मैं ही आकार लूँ. मैं ही स्वीकार लूँ
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
         सब ‘प्रकृति’ है।
हाँ मैं...
     प्रकृति हूँ....!!     फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
   वचन क्या! प्रवचन क्या!
   सिध्दांत ही वचन है,
   प्रवचन में ही व्यक्तित्व है।
   मैं ही तरंग हूँ, मैं ही बेरंग हूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ
मेरे लिए...
         सब ‘प्रत्यक्ष’ है।
हाँ मैं...
     प्रत्यक्ष हूँ...!!      फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!

                    __--***--__


मेरे लिए...
                                         धूप क्या! छाँव क्या!
   धूप ही कर्म है,
   छाँव ही कर्म का फल है।
   मैं ही सूत्र हूँ, मैं ही उन्मुक्त हूँ।
   एकल सत्य है – मैं एक ‘फ़क़ीर’ हूँ।
मेरे लिए...
         सब ‘आशीष’ है।
हाँ मैं...
     आशीष हूँ...!!    फ़क़ीर हूँ...!!
     फ़क़ीर हूँ...!!     फ़क़ीर हूँ...!!
                                                                         ©prakashsah



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Saturday, 18 May 2019

अधर में फंसा जीवन (Adhar Mein Fasa Jeevan) - ps

।। अधर में फंसा जीवन ।।

अधर में फंसा जीवन (Adhar mein fasa Jeevan) - UNPREDICTABLE ANGRY BOY www.prkshsah2011.blogspot.in

अधर में फंसा जीवन, किधर से सुलझाऊँ इसे
क्रोध सम्पूर्ण आवेग में, सर-धर से बुझाऊँ कैसे

जिधर देखू अगम्य मार्ग, विश्राम वहीं शरीर का
पीठ का भार आलस, श्रम स्वयं करूँ कैसे

तन का तंत्र अपवित्र, चरित्र को सुधारूँ कैसे
नेह का चेतना नहीं, रोम-रोम पहुंचाऊँ कैसे

वाद-विवाद का हिस्सा, करता मंच का चुनाव नहीं
त्वरित मुख का खुल जाना, जिह्वा को संभालूँ कैसे

आदर्श व्यक्तित्व हैं बहुत, अंतरात्मा में उतारूँ किसे
पहाड़-सा अहम-अंहकार है, स्वयं को झुकाऊँ कैसे

प्रत्येक कार्य में हठी, पूर्ण करके ही उठूंगा
भूख प्यास त्याग दी, हृष्ट-पुष्ट देह बने कैसे

देर निद्रा का आदी है, तंद्रा में बदलूँ  कैसे
वक्त का अकर्म व्यय, काल को रोकूं कैसे

रण आंदोलन मन बुझ गया, अब कौन हाहाकार मचाए
अन्य की सहायता चाहूं ना, सपनों की सीढ़ियाँ चढूं कैसे
                                              ©ps 'प्रकाश साह'

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Thursday, 1 November 2018

तुम्हारी याद में (Tumhari Yaad Mein) -ps

तुम्हारी याद में (Tumhari Yaad Mein) -ps prkshsah2011.blogspot.in


।। तुम्हारी याद में ।।


तुम्हारी याद में

रात-रात बीत गयी

कि तुम गये कहीं नहीं

मुझे छोड़कर...

..कैसे लूँ जगह, तुम्हारी मैं -

राह-राह चलते तुम

आँखों में अचानक

आ जाते हो।

क्षण-में-क्षण-में सामने आ,

....ओझल हो जाते हो....

..........................................

चेहरे के किसी कोने में

दर्द की कुछ सिकन

दिख जाएगी...

कण-कण में तुम,

तन-मन में तुम।

जिस
 ओर देखूँ मैं,

हर ओर नजर

आते हो तुम।

©PS

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