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Friday, 8 November 2019

कल्पतरू - prakash sah


कल्पतरू (KALPTARU) - Prakash sah - UNPREDICTABLE ANGRY BOY - www.prkshsah2011.blogspot.in


‘मेरा जन्म हुआ है’
इसका आभास हुआ जब...
एक स्वप्न देखा मैंने
सुखी गृहस्थ बसाने का।


रोजमर्रा का साक्ष्य
वही बदरंग कंक्रीट दृश्य
जहाँ घर ‘कल्पतरू’ के
छाँव में ना था
वहाँ खुशहाली कैसी आएगी?
जब दुःख के घड़ी में
इसे हरने वाली
हरियाली ना होगी।

निश्चल मन,
शुद्ध विचार,
प्रेम भाव,
या जग से परे कुछ कल्पित भाव
की इच्छा पूर्ती करने वाला
एक वृक्ष ही है
एक ‘कल्पतरू’ ही है।

                 जन्म, प्रकृति के लिए हुआ है
और प्रकृति से ही मेरा अस्तित्व है।
हरा रंग हरियाली का
सुखी गृहस्थ का मंत्र है।

‘मेरा जन्म हुआ है’
इसका आभास हुआ जब...
एक स्वप्न देखा मैंने
सुखी गृहस्थ बसाने का।
           ©prakashsah


***


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UNPREDICTABLE ANGRY BOY
PRKSHSAH2011.BLOGSPOT.IN
P.C. : GOOGLE

Sunday, 27 October 2019

कहानी दिल की... -prakash sah

सुनिए इस कविता को मेरी आवाज़ में...👇👇



कहानी दिल की (kahani dil ki) - Prakash sah - UNPREDICTABLE ANGRY BOY -  www.prkshsah2011.blogspot.in



कहानी दिल की कहाँ से शुरू करूँ
शुरू होने से पहले ही खत्म हो गयी


ख्वाबों का दरिया था मैं
पर एक ख्वाब भी मेरा सच्च ना हुआ


वो इंतजार वाली घड़ी मेरे पास ही है
पता चला है, वो कहीं आसपास ही है


उड़ते अफवाहों को कितना सच्च मानूँ
मैं उसके दिल में था, ये कैसे जानूँ?


खैर अब तो ये सब, दूर की बात है
वो किसी दूसरे शहर में, किसी दूसरे के साथ है 


किसी सफर में जब भी अकेला रहता हूँ 
उसी को सोचकर कुछ लिखता रहता हूँ 


कारण का बस इतना ही कहानी है 
वो मेरे दिल में है, यही मेरी नदानी है 


यही मेरी कहानी है, यही मेरी कहानी है... 
- ©prakashSah




***
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©prakashsah
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Friday, 10 November 2017

देर रात अंधियारे में (Der Raat Andhiyare mein : Late Night) -ps

।। देर रात अंधियारे में ।।

Nightingale

तु क्यूँ चहकती रात के अंधियारे में,

क्यूँ तेरे पेट का मिलाप नही हुआ स्वादिष्ट आहारों से !

तुझे नही दीखता अब मैं सो गया, गहरी निंदों में,

तु पहले क्यूँ नही आयी, जा अब मै ना निकलूँ, इस गर्म रजाई से ।

मेरी एक लालसा तु समय पर आया कर, जिससे डूब जाऊँ तेरी स्वरगूँजन में ।

तु बार-बार क्यूँ भूल जाती, मै आलसी हूँ लड़कपन से ।

तेरी ये चहचहाहट सुनने के लिए ही जगता, देर तक इस अंधियारे में,

Thursday, 13 April 2017

दीर्घ निद्रा (Deep Sleep : Deergh Nidra) -PS

The whole world seems like someone is dreaming it everyday...

।। दीर्घ निद्रा ।।
ईश्वर हैं या नही, या फिर होतें विश्वास नामभर मात्र,
हम कठपुतलियाँ है या किसी स्वपन-रूपी चलचित्र का पात्र ।

स्वप्न-रूपी यह संसार ही है,
कोई लम्बे वक्त से सोया है दीर्घ निद्रा में,
स्वप्नो में ही कहानियाँ बुनता,
हम उसके भाँती-भाँती पात्र है ।