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| PC : @prakashsah |
ज़हन में जब कुछ राज़ दफन किये जाएँगे,
तो सच में शहर में बहुत कोई अपने हो जाएँगे।
लगन से जब कुछ पौधें शहरी भाषा सीख जाएँगे,
तो सच में शहर में कई बग़ीचे जंगल हो जाएँगे।
मेरी कुछ अन्य नयी रचनाएँ....
आप सभी का इस ब्लॉग पर स्वागत है। इस ब्लॉग को लिखने का कुछ खास उद्देश्य नहीं है। एक इंसान को अपने जीवन में हर दिन कई भाव विचारों से गुजरना पड़ता है। बस इन्हीं भावों को कविताओं के माध्यम से आपसब के साथ साझा करने का मुझे यह एक उचित स्थान लगा। आप मेरे लिखे रचनाओं के माध्यम से इस ब्लॉग के नाम का सार्थक परिभाषा भी जान सकते हैं। मेरी रचनाएँ कुछ काल्पनिक हैं और कुछ वास्तविक हैं। इससे किसी के जीवन में मार्गदर्शन मिल जाये तो बस यह एक संयोग मात्र होगा। [अंतिम पंक्ति आपके चेहरे पे मुस्कान लाने के लिए था]
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| PC : @prakashsah |
ज़हन में जब कुछ राज़ दफन किये जाएँगे,
तो सच में शहर में बहुत कोई अपने हो जाएँगे।
लगन से जब कुछ पौधें शहरी भाषा सीख जाएँगे,
तो सच में शहर में कई बग़ीचे जंगल हो जाएँगे।
मेरी कुछ अन्य नयी रचनाएँ....
तुम्हें, हम भूल गयें, ऐसा अभी हम कहने वाले ही थे
श्मशान में भीड़ है, अरे! हम अख़बार में ये क्या पढ़ रहे हैं
जब चुनाव था, शायद तुम्हें रिश्वत से भगाया गया था
तुम्हें उकसाया जा रहा, शायद वैक्सीन के दलाल कूद पड़े हैं
हम एक कमरे में बंद सिर्फ तुम्हें ही लिखे जा रहे हैं
वो तुम्हीं वज़ह हो कि शहर-के-शहर बंद किए जा रहे हैं
जब तुम छूप-छूप के देखती हो, किसी सांसों के सहारे
केवल हम ही नहीं, सब मुँह छुपाए तुमसे भागे जा रहे हैं
तुम्हें, हम भूल गयें, ऐसा अभी हम कहने वाले ही थे...