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| PC : @prakashsah |
मुमकिन नहीं तुम्हारा मेरा होना,
यूँ ही उम्र को पहले मैंने बुलाया नहीं।
सच है कि यूँ ही कोई
'उम्र' को पहले बुलाया नहीं करता,
बेवक्त घर में उन्हें अचानक
छोटा से बड़ा होना जाना पड़ता होगा।
कुछ अन्य नयी रचनाएँ....
आप सभी का इस ब्लॉग पर स्वागत है। इस ब्लॉग को लिखने का कुछ खास उद्देश्य नहीं है। एक इंसान को अपने जीवन में हर दिन कई भाव विचारों से गुजरना पड़ता है। बस इन्हीं भावों को कविताओं के माध्यम से आपसब के साथ साझा करने का मुझे यह एक उचित स्थान लगा। आप मेरे लिखे रचनाओं के माध्यम से इस ब्लॉग के नाम का सार्थक परिभाषा भी जान सकते हैं। मेरी रचनाएँ कुछ काल्पनिक हैं और कुछ वास्तविक हैं। इससे किसी के जीवन में मार्गदर्शन मिल जाये तो बस यह एक संयोग मात्र होगा। [अंतिम पंक्ति आपके चेहरे पे मुस्कान लाने के लिए था]
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| PC : @prakashsah |
मुमकिन नहीं तुम्हारा मेरा होना,
यूँ ही उम्र को पहले मैंने बुलाया नहीं।
सच है कि यूँ ही कोई
'उम्र' को पहले बुलाया नहीं करता,
बेवक्त घर में उन्हें अचानक
छोटा से बड़ा होना जाना पड़ता होगा।
कुछ अन्य नयी रचनाएँ....
Dear You,
आज शाम के
पाँच बज रहे थें
और
तुम्हारी बातों से लगा
आज तुम
कुछ बुझी सी हो।
कई दिनों से
मुझे भी
कुछ कहना था तुमसे।
कुछ बातें याद आती है
तुम्हारे लिए,
हर बार सोचता हूँ
कि
सब बोल दूँ तुम्हें।
अच्छा....!!!
एक खूबसूरत बात
पता है तुम्हें....
मैं
बोल भी देता हूँ
वो सारी बातें
जो सोच रहा होता हूँ
तुमसे बोलने के लिए।
पर
फिर भी लगता है कि
कुछ अधूरा रह गया है
तुमसे बोलने को।
ऐसा क्यूँ होता है?
ये तुमसे भी पूछ लूँ क्या?
ये भी
उसी वक्त
सोचने लगता हूँ।
कितना अज़ीब है ना!!
एक सवाल के जवाब को
ढूँढ़ने में
एक और सवाल
मेरे पास आ जाता है।
है ना अज़ीब!!!!
-प्रकाश साह
20092022
मेरी कुछ अन्य रचनाएँ....
मैंने इस रचना को 2 नवम्बर 2019 को लिखा था लेकिन आज मैं इसे आपलोग के साथ साझा कर रहा हूँ। इसका भी एक हास्यास्पद कारण है और वह यह है कि इसका मुझे कोई सटीक शीर्षक नहीं मिल रहा था। यही एकमात्र कारण है कि मैं इसे अपने ब्लॉग पर छाप नहीं पा रहा था।
पर अंततः यह मेरी खोज़ कुछ दिन पहले ही पूरी हुयी। और फिर आज आपसब के सामने एक सटीक शीर्षक के साथ यह नीचे प्रस्तुत है।
हर कोई बीत जाए
ये मुम़किन नहीं
उनका देह नहीं तो
नाम ज़िंदा रहेगा
हर कोई बदल जाए
ये मुम़किन नहीं
उनका साथ नहीं तो
आशीष सदा रहेगा
हर कोई रूठ जाए
ये मुम़किन नहीं
व्यवहारों से
नहीं तो
यादों से मना
लीजियेगा
हर कोई नास्तिक
हो जाए
ये मुम़किन नहीं
भजन से आस्तिक
नहीं तो
सेवाभाव से बन
जाइएगा
-प्रकाश साह
021119
मेरी कुछ अन्य रचनाएँ....
1. ऐ मूरत! तुझे बदलने की है ना ज़रूरत - PRAKASH SAH
2. बुरा नहीं हूँ मैं - Prakash Sah | Pooja Pandey
3. यूँ ही कब तक अकेले मचलते रहेंगे | कोरोना, शहर और मेरी मोहब्बत - QUARANTINE |PS
मैं आप सभी को बता दूँ इस रचना के आरंभ की चार पंक्तियाँ POOJA PANDEY JI द्वारा लिखी हुई है। मैंने जब इन चार पंक्तियों को पढ़ा तो स्तब्ध रह गया। मैं भी खुद को रोक ना पाया और इसके बाद की चार पंक्तियां मैंने लिख कर Pooja Ji को भेजा। उन्होंने मेरी पंक्तियों की सराहना की।
Pooja Pandey जी की लिखी वो चार पंक्तियाँ...
"......
बुरा नहीं हूँ मैं
मेरी भी कुछ कहानी है
टूट चुका हूँ मैं
अपनों की मेहरबानी है
........"
फिर मैंने उनको सलाह दिया कि आप इसके आगे और लिखिए क्योंकि आपने आरंभ बहुत अच्छा किया है........और साथ में मैंने यह भी कहा कि शुरू की पंक्तियां अगर मेरी होती तो फिर मैं इसके आगे की कुछ और पंक्तियाँ भी जरूर लिखता।
ज़वाब में उन्होंने मुझे कहा कि "आप लिखिए...मुझे कोई परेशानी नहीं होगी अगर आप लिखोगे तो।" अब उन्होंने मुझे #इजाजत दे दी।
मैंने इन शुरू के चार पंक्तियाों को थोड़ा अपना मानकर लिखना शुरू कर दिया। यह POOJA ji की ही मेहरबानी है जो मैं नीचे लिखे हुये पंक्तियों को लिखने में सफल रहा।
उनका बहुत-बहुत धन्यवाद, जो उन्होंने मुझे अपनी पंक्तियों से लिखने की #प्रेरणा दीं। बहुत-बहुत आभार।
_______________
●○●○●
मैंने उनसे एक और इज़ाज़त माँगी कि आप मुझे इसे मेरे BLOG पर छापने की इज़ाज़त दीजिए। उन्हाेंने मुझे बहुत ही सहजता से इसकी इज़ाज़त दे दीं। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि यह रचना आपने रचा है और इतनी बेहतरीन रचना के लिए आप ही सराहना के हकदार हैं।......पर मेरा मानना है कि वो भी बराबर की सराहना की हकदार हैं।
तो आज उनकी इज़ाज़त से मैं आपसब को पूरी रचना पढ़ने का अवसर दे रहा हूँ। चलिए अब पढ़ते है इस रचना को....
...
बुरा नहीं हूँ मैं
मेरी भी कुछ कहानी है
टूट चुका हूँ मैं
अपनों की मेहरबानी है
रोया नहीं हूँ मैं
मेरी कुछ यादें पुरानी है
भूल चुका हूँ मैं
बस वो रिश्तें गँवानी है
झूका नहीं हूँ मैं
मेरी भी कुछ मज़बूरी है
भटक चुका हूँ मैं
ये ज़िंदगी भी ज़रूरी है
अंजाना नहीं हूँ मैं
मेरी कुछ बातें संजीवनी है
आज़मा चुका हूँ मैं
उन में क्या-क्या बिमारी है
-प्रकाश साह | पूजा पाण्डेय
मेरी कुछ अन्य रचनाएँ....
तुम्हें, हम भूल गयें, ऐसा अभी हम कहने वाले ही थे
श्मशान में भीड़ है, अरे! हम अख़बार में ये क्या पढ़ रहे हैं
जब चुनाव था, शायद तुम्हें रिश्वत से भगाया गया था
तुम्हें उकसाया जा रहा, शायद वैक्सीन के दलाल कूद पड़े हैं
हम एक कमरे में बंद सिर्फ तुम्हें ही लिखे जा रहे हैं
वो तुम्हीं वज़ह हो कि शहर-के-शहर बंद किए जा रहे हैं
जब तुम छूप-छूप के देखती हो, किसी सांसों के सहारे
केवल हम ही नहीं, सब मुँह छुपाए तुमसे भागे जा रहे हैं
तुम्हें, हम भूल गयें, ऐसा अभी हम कहने वाले ही थे...
-Prakash Sah
अशुद्ध मन में पूजा तेरी,
लक्ष्य काे भेदा नहीं।
"अशुद्ध हुआ तेरा मन"
तुमने इसे जाना कैसे?
'शुद्धता' क्या अभी शेष है!
या, फिर यह भी तुम्हारा
काेई नया भेष है!
क्याेंकि बेवज़ह कुछ भी हाेता नहीं...
-Prakash Sah
क्या कहूँ!
कहने को
बहुत कुछ है-
मुझसे
सब नाराज़ हैं,
बस...
यही कहने को है।
एक-एक कर
सब दूर
हो रहें हैं
मुझसे।
उथल-पुथल
मच गया है
जीवन में।
इसकी
वजहें
बहुत है
बस...
समझ
नहीं आ रहा...
कि
कहाँ से
और कैसे
सुलझाउँ इसे?
कि
दिल की
सुनूँ या
दिमाग की?
एक अविश्वास
का पुल
बन गया है
मन में।
और
इस कदर
इस पर
बढ़ गया हूँ...
कि
दूरियाँ,
दिल और
दिमाग तक की
बस...
आधी रह गई है।
क्या कहूँ...
कहने को
बहुत कुछ है!
मुझसे
सब
नाराज़ हैं
बस...
यही कहने को है।
©prakashsah

शून्य की आकृति में
अनगिनत बिंदु का परिश्रम है।
कंकर-कंकर पथ पर
पाँव के छाले इसके मूल्य है।
शून्य ही समय है,
अनगिनत की गिनती में
शून्य ही, इसका मान है,
प्रमाण है।
शून्य को आकार दो,
कर्म के पराक्रम से,
अणु से ब्रह्माण्ड तक,
बिंदु से लकीर तक,
इंसान से फ़कीर तक
बनने के सफर में।

