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Monday, 1 March 2021

अशुद्ध मन - prakash sah

 

अशुद्ध मन में पूजा तेरी,

लक्ष्य काे भेदा नहीं।

"अशुद्ध हुआ तेरा मन"

तुमने इसे जाना कैसे?

'शुद्धता' क्या अभी शेष है!

या, फिर यह भी तुम्हारा

काेई नया भेष है!

क्याेंकि बेवज़ह कुछ भी हाेता नहीं...

-Prakash Sah


  नीचे कमेंट बॉक्स में मुझे लिखकर जरूर बतायें कि यह रचना आपको कैसी लगी। अगर आपका कुछ सुझाव हो तो उसे भी मेरे साथ साझा करें।     

🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏

Sunday, 26 November 2017

मृगुवक (Mriguvak) -ps


मृग और युवक के संधी से  शब्द 'मृगुवक' बना है (मृग + युवक = मृगुवक) ।

हम सब ने एक सुप्रसिद्ध कहानी पढ़ा या सुना होगा जिसमें एक मृग (हिरण)  जंगल में एक अज्ञात सुगंध के पिछे पागल रहता है और इसकी खोज में पुरे वन को खंगाल देता है पर वह इसे ढूँढ़ने में सफल नही हो पाता। क्योकि वह सुगंध उसके ही नाभी में होती है और वह इससे पुरी तरह अनभिज्ञ है। 

इसी प्रकार एक युवा अपनी काबलियत के बारे में जानने की कोशीश नही करते हैं और ज्यादातर युवा भेड़ चाल में विश्वास करने लगते हैं। दूसरा क्या कर रहा ? .....इसी को ध्यान में रखकर वह ज्यादातर समय में वे अपनी सोच को तय करते हैं। 
एक युवा के अंदर में हमेशा कुछ नया करने की आग होती है.....उनमें भरपूर  जोश और उत्साह साथ होता है । 
युवा हर समस्या का हल है...चाहे वह समस्या कितना ही कठिन क्यों ना हो । युवा सृजनकर्ता है। यही विद्युत हैं, यही प्रवाह हैं।

हमे अपना आदर्श स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी, भगत सिंह और ऐसे अन्य को मानकर....उनका अनुसरण करना चाहिए । हमे हिरण से सबक लेकर....खुद को जानने का खुब मौका देना चाहिए....ना कि भेड़ चाल चले।
युवा को अपना क्रोध, उत्तेजना, जोश और उत्साह को सार्थक नियंत्रण करके आगे बढ़ना चाहिए.... और अपने जड़त्व को ना भूलें।

।। मृगुवक ।।


गरज तू बरस तू

धड़क तू रक्त तू

सन्न है मन में

विद्युत तू प्रवाह तू
-

सनक तू भड़क तू

देर तू अधिर तू

शांती है गांधी में

ज्ञान तू किताब तू
-

जड़ तू धड़ तू

प्रखर तू नव तू

लय है स्वामी में

जान तू खोज तू
-

दहाड़ तू लपक तू

उठा तू बंदुक तू

बलिदान है सिंह में

त्रिमूर्त तू प्रत्यक्ष तू
-

दौड़ तू संभल तू

सुगंध तू सृजन तू

रहस्य है वन में

हिरण तू कस्तुर तू
©ps

*आप अपनी प्रतिक्रिया मेरे साथ जरूर साझा करें।

शब्दार्थ
त्रिमूर्त : शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव


Monday, 24 July 2017

ढूँढ़ो जीवन प्यार का (Dhundhon Jeevan Pyaar Ka) -ps

 ।। ढूँढ़ो जीवन प्यार का ।। 



ढूँढ़ो जीवन प्यार का,
हवा, पानी, धूप सूत्रधार इस जीवन का ।
जितना चाहो उतना ले लो,
हर सुख मिलेगा इस संसार का ।

राह का इकरार करो
अनजाना-सा सफर का,
अंत नहीं अभी शुरूआत है,
मिलेगी मनचाही मंजिलें,
बस इंतजार है आत्मसात का ।

बढ़ते राह में भूल हुई,
अब क्या होगा उस कार्य का,
जिसके लिए मैनें दिन-रात लगाई ?
फिर से तुम आगे बढ़ो, बढ़ना तुम्हारा काम है,
सदैव उस भूल के याद में रहना नहीं,
वो कार्य है आत्ममंथन का ।
कारण है बस इतना –
“अंत का कोई छोर नहीं,
शुरूआत का कोई भोर नहीं"

जिंदगी नाम है उस सफ़र का,
जिस सफ़र के लिए तुम जिन्दा हो ।
तुम परिन्दा हो परिन्दा !
अपने सपनों के पंख फैलाया करो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो...
©ps


Friday, 16 December 2016

मेरा मन डगमगाता (Mera mann dagmagata) -PS


।। मेरा मन डगमगाता ।।
मेरा तन सहलता
हवा के झोंको से,
पताका डूलता हर दिशा में,
मेरा मन डगमगाता
हर मुश्किल दशा में ।