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Saturday, 23 May 2020

मैं अभी थका नहीं - prakash sah

मैं अभी थका नहीं ( MAIN ABHI THAKA NAHI ) - prakash sah - Unpredictable Angry Boy -  www.prkshsah2011.blogspot.com


            (1)

मैं अभी थका नहीं

मैं अभी रूका नहीं

एक प्रण है मेरा

अंत मेरा गुमनाम ना हो

सोच के भँवर में

मन के अँधेरे में

मैं कभी फँसा नहीं

मैं कभी बुझा नहीं

 

हाँ...! मैं अभी थका नहीं

        मैं अभी रूका नहीं


            (2)

समय घड़ी की चलती है

बिना लिए अनुमति किसी की।

राज रजनी का ढूँढ़ना है

भोर-सा मुझे बनना है

बीती बात भूल जाना है

मैं अभी हारा नहीं

मैं अभी डरा नहीं

 

हाँ...! मैं अभी थका नहीं

        मैं अभी रूका नहीं

 

            (3)

सहनशील व्यवहार लाना है

नित्य सहज करम करना है

निज बातों का प्रबल समर्थक

स्वयं में इसका बीज बोना है

मैं अभी हम नहीं

हम अभी बनना है


मैं अभी थका नहीं

मैं अभी रूका नहीं...

 

हाँ...! मैं अभी थका नहीं

        मैं अभी रूका नहीं

                                                       -prakash sah



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©prakashsah
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Monday, 2 December 2019

स्थिति में कोई बदलाव नहीं.............-prakash sah


हमारे समाज में प्रत्येक दिन कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटती है पर इनमें से कुछ घटनानाएँ देश को बिल्कुल झकझोर देती है। इसका उदाहरण हमें बिते वर्षों में कई बार देखनों को मिला है।

2012 के निर्भया कांड से देश का कौन-सा व्यक्ति प्रभावित नहीं हुआ होगा। सबने अपने आक्रोश का प्रदर्शन किया था। हमारे शहरों की सड़कें इसकी साक्षी हैं।
पर इस 27 नबम्बर की घटना से मुझे पक्का विश्वास हो गया कि 2012 से लेकर आज तक की स्थिति में ज़रा सा भी बदलाव नहीं आया है...अंतर बिल्कुल शून्य है.......स्थिति जस की तस है।

इन सभी घटनाओं के बाद की स्थिति को देखकर मुझे इतना ही समझ आया है कि हम जितना जल्दी स्वयं को धधका लेते हैं उतना ही जल्दी स्वयं को बुझा भी लेते हैं....जैसे कुछ हुआ ही ना हो.........और फिर हम किसी दूसरी खबर की ओर बढ़ जाते हैं।

स्थिति में कोई बदलाव नहीं - STHITI MEIN KOI BADLAO NAHI - Prakash sah - UNPREDICTABLE ANGRY BOY -  www.prkshsah2011.blogspot.in

मैं माफी के साथ एक बात कहना चाहूँगा कि हम जितना किसी एक घटना पर आक्रोशित होते हैं उतना ही कोई और या ऐसी ही प्रत्येक घटना पर आक्रोशित नहीं होते हैं। गिने-चुने घटनाओं पर ही हम अपने गुस्से का प्रदर्शन करते हैं। इसका सीधा - साधा एक ही अर्थ निकलता है हमे भेड़ चाल चलने की आदत हो गई है।
              अक्सर देखने को मिलता है कि कुछ लोग बिल्कुल चुपचाप बैठे रहते हैं चाहे घटना कितनी भी बुरी क्यों ना हो। लेकिन यही लोग जैसे ही देखते हैं कि भीड़ बढ़ चुकी है तब अपनी प्रतिक्रिया व राय देते हैं......या फिर किसी कारणवश अगर भीड़ नहीं बढ़ी तब सब चुपचाप ही बैठे रह जाते हैं....जैसे वो घटना घटी ही नहीं है।

हमें अपनी सोच बदलनी होगी....हमें प्रत्येक घटना पर अपनी जोरदार प्रतिक्रिया देनी होगी चाहे वो घटना छोटी हो या बड़ी....चाहे छोटे कस्बे की हो या किसी रिहायशी इलाके की.....चाहे किसी छोटे शहर की हो या किसी मेट्रोपोलिटन शहर की। भीड़ को देखकर अपना विचार तय नहीं करना होगा।
जिस दिन प्रत्येक लोग अपने बुद्धि, विवेक और संस्कार से तय करने लगेंगे कि यह घटना हमारे समाज के सोच से बिल्कुल विपरीत एवं संक्रमित है तब...जो 2012 से लेकर अभी तक के स्थिति में अंतर शुन्य है....उसमें कुछ बदलाव देखने को मिले।
और आज मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि इस बार बदलाव आने तक हमसब स्वयं को बुझने नहीं देंगे।

स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार पर एक ऐसी ही घटना 2017 में टेलीविज़न न्यूज़ के माध्यम से देखने को मिला था। 2017 के नव वर्ष के जश्न पर दिल्ली और बेंगलुरू में कुछ युवायों ने स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार किया था। यह घटना भी बिल्कुल दुर्भाग्यपूर्ण व असहनीय था.....एवं अक्षम्य था।
इस घटना को मैंने अपनी एक रचना में व्यक्त किया था......मैं चाहूँगा आप एक बार जरूर पढें।
शायद आपलोग को पता चले हम कितना स्थिर हैं।



....
आधुनिकता के नाम पर तर्क रखने वालों
तेरी छोटी बुद्धि का तर्क ‘कुतर्क’ है।
तू अपनी हरकतें संभाल ले 
या फिर अपनी बरकतें गँवा दे।
तेरी पीढ़ी के साथ हम भी उगे हैं...
हम चौक-चौराहों पे मोमबत्ती नहीं,
मन में सम्मान की लौ जला कर चले हैं

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Wednesday, 15 November 2017

चुनावी मौसम (Election Time) -ps

चुनावी मौसम



चुनाव का मौसम,
मतदान एक रश्म ।
18 से ऊपर के मतदाता,
आते चुनने अपना राष्ट्रनिर्माता ।
कर्तव्य निर्वहन
करते सब अपना अपना,
सबको प्यारा देश अपना ।
सपना किसका पूरा करते नेता,
यूँ ही चलता
पता नहीं किसको कितना हक मिलता ।
जो जीता वही सिकंदर,
वही सांसद होते संसद के अंदर ।
चुनते वे एक नेता होतें वह प्रधानमंत्री,
इनके ही इर्द-गिर्द होतें भिन्न-भिन्न मंत्री-संत्री ।

पाँच साल का काल
साल-दर-साल
नेता हुएं मालामाल ।
ऐसे ही चला
क्रम-दर-क्रम हर सरकार
जनता हुई बेहाल ।
कौन है इसका जिम्मेदार
हम या सरकार ?

जागरूक कौन होगा ?
एक कार्य पूर्ण कर

Saturday, 23 September 2017

बदलाव (TRANSITION : Badlaaw) -ps

“सच्च कहा है किसी ने की वक्त के साथ हर कोई बदल जाता है, 
गलती उसकी नही जो बदलता है, 
गलती उसकी होती है जो पहले जैसा रह जाता है”

मेरा मानना है...यह कथन कुछ या कहूँ कि बहुत हद तक सही नही है,
मेरा विचार कुछ भिन्न है : 

।। बदलाव ।।


माना किसी ने सच्च कहा है कि

बदलाव जिंदगी की एक रीत हो,

पर वो बदलाव ही किस काम की,

जिसमें साथी के साथ रहने का ही ना गीत हो ।



उस तूफान का ही क्या काम,

जिसमे हवा अपनी राह ना बदले ।

पर उस हवा को सलाम

जो धूल को भी अपनी बदलाव की

Wednesday, 30 August 2017

कम-से-कम मार्गदर्शक तो बना (Kam-se-Kam Maargdarshak to Bana) -ps

।। कम-से-कम मार्गदर्शक तो बना ।।

कम-से-कम मार्गदर्शक तो बना (maargdarshak) -ps prkshsah2011.blogspot.in

रात बित जाए कि दिन बित जाए,
फर्क ना पड़े कौन क्या कहे कि हम क्या रह गएं।
तु  भी तो कभी वही था, जो हम आज हैं,
‘राज’ राज रह गया जब हम दोनो चाह गएं।

किस ओर मैं बढ़ गया राह का न पता चला,
तुझे उस ओर देखा तो राह बदल डाला।
इतना तो पता चला जिस राह पे तु लगातार बढ़ा,
उस राह से मुझे मेरी मंजिल कभी सही ना मिला।

तु गलत था या सही था,
इसमें अब मैं समय बर्बाद नही करता।
तु मेरे जीवन का आदर्श नहीं तो
कम-से-कम मार्गदर्शक तो बना। 
©ps

Thursday, 17 August 2017

किस कदम पे तुम चली हो (Kis Kadam Pe Tum Chali Ho) -ps

।। किस कदम पे तुम चली हो ।।

किस कदम पे तुम चली हो
देखें तो हम ज़रा
रात बित गई कि तुम कहाँ रूकी हो
देखें तो हम ज़रा
साथ छूट गया कि अब भी कुछ बचा है
देखें तो हम ज़रा
आसपास की मुश्किलें, घट रही या बढ़ रही है
देखें तो हम ज़रा
मन के मन के तारों में यादों की धमनियाँ
कि चल रही है या नही
देखें तो हम ज़रा
देखें तो हम ज़रा
देखें तो हम ज़रा
कि...
किस कदम पे तुम चली हो
किस कदम पे तुम चली हो
किस कदम पे तुम चली हो
देखें तो हम ज़रा
©ps

Tuesday, 15 August 2017

आज़ादी (Independence ) -ps

।। आज़ादी ।।

है आज़ादी ! है आज़ादी ! है आज़ादी !
कह दो ना
है आज़ादी ! है आज़ादी ! है आज़ादी !
जब सोच में कोई बंदिशे
तो कह दो क्या
है आज़ादी ? है आज़ादी ? है आज़ादी ?
जब हमसे कोई दूर हो तो क्या
है आज़ादी ? है आज़ादी ? है आज़ादी ?
जब मन में ना कोई गिले शिकवे हो तो
है आज़ादी ! है आज़ादी ! है आज़ादी !
साथ-साथ चलके आगे बढ़ना है तो
है आज़ादी ! है आज़ादी ! है आज़ादी !
देश में रहना है तो कहना है
वंदे मातरम् ! वंदे मातरम् ! वंदे मातरम् !
हाँ ! है यही, है यही, है यही
आज़ादी ! आज़ादी ! आज़ादी !
तो कह दो ना
है आज़ादी ! है आज़ादी ! है आज़ादी !
©ps


Monday, 24 July 2017

ढूँढ़ो जीवन प्यार का (Dhundhon Jeevan Pyaar Ka) -ps

 ।। ढूँढ़ो जीवन प्यार का ।। 



ढूँढ़ो जीवन प्यार का,
हवा, पानी, धूप सूत्रधार इस जीवन का ।
जितना चाहो उतना ले लो,
हर सुख मिलेगा इस संसार का ।

राह का इकरार करो
अनजाना-सा सफर का,
अंत नहीं अभी शुरूआत है,
मिलेगी मनचाही मंजिलें,
बस इंतजार है आत्मसात का ।

बढ़ते राह में भूल हुई,
अब क्या होगा उस कार्य का,
जिसके लिए मैनें दिन-रात लगाई ?
फिर से तुम आगे बढ़ो, बढ़ना तुम्हारा काम है,
सदैव उस भूल के याद में रहना नहीं,
वो कार्य है आत्ममंथन का ।
कारण है बस इतना –
“अंत का कोई छोर नहीं,
शुरूआत का कोई भोर नहीं"

जिंदगी नाम है उस सफ़र का,
जिस सफ़र के लिए तुम जिन्दा हो ।
तुम परिन्दा हो परिन्दा !
अपने सपनों के पंख फैलाया करो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो...
©ps


Saturday, 3 June 2017

रेगिस्तान का पौधा (Registaan ka Paudha) -ps

पुरानी डायरी से :


।। रेगीस्तान का पौधा ।।

पहले मै फूलों के बगीचे का फूल था,

शायद अब मैं उस बगीचे का काँटा हूँ,

अब पसंद किसी को ना आता हूँ ।

माली से भी ना कभी ख्याल किया गया

कब मैं ‘रेगिस्तान का पौधा’ बन गया ।

Saturday, 3 December 2016

सोच समय की (Soch Samay Ki) - P.S.

पुरानी डायरी से :
🕘 सोच समय की🕒

👉👂  दो कदम आगे जाने को सोचा,             
क्रमबद्ध मुश्किल आने को आया

पर किसी ने  ना पुछा, ना समझा

सब ने सोचा तेज है बच्चा ।


'सब ने सोचा...तेज है बच्चा'

हमने भी यही सोचने की गुस्ताखी की,

समय ने ना कभी दुबारा लोटने को मौका दी ।

पर अब हमने भी ठान ली है ये गुस्ताखी करने की,