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Saturday, 19 October 2019

पहचान कौन ??? (Pehchaan Kaun???)

सरकारी दफ्तर में एक साधारण व्यक्ति और अधिकारी के बीच का संवाद एवं सरकारी दफ्तरों के दृश्य जहाँ आप इस नए भारत में महात्मा गाँधी और उनके विचारों को नए रूप में पाएँगे।
क्या आप हमारे नए 'गाँधी' को जानते हैं?
शायद इस सवाल का जवाब आप मेरे इस रचना में ढूँढ लें...

पहचान कौन ?


पहचान कौन (PEHCHAAN KAUN) - Prakash sah - UNPREDICTABLE ANGRY BOY www.prkshsah2011.blogspot.in


नष्ट-भ्रष्ट ईमान से,

सुस्ती इनकी पहचान है।

मीठे इनके बोल सुनो,

कार्य इनके अधूरे हैं।

इनके गोल-गोल बातों में घूमो

इन्हें ‘गाँधी’ की खोज है।


अगर आप इस खोज में

सहायता का हाथ बढ़ाओ,

फिर आप इनकी तत्परता देखो,

कार्यकुशलता इनकी देखो,

झटपट आपके सारे काम हुयें,

चिंतामुक्त अब आप  हुयें।


अरे, क्या हुआ!!!

बस.....आपके थोड़े ‘गाँधी’ ही तो गए हैं,

कोई बात नहीं......फिर आ जाएँगे।

आप भी कुछ ‘गाँधी’ दूसरों से ले लीजिए,

यही तो ‘नये भारत’ का ‘न्यू इकोसिस्टम’ है।

-prakash sah (©ps)


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Tuesday, 8 October 2019

बाढ़ में बादल (Baadh Mein Badal) - prakash sah



बाढ़ में बादल

बाढ़ में बादल (Baadh Mein Badal) - Prakash sah - UNPREDICTABLE ANGRY BOY www.prkshsah2011.blogspot.in



बदइंतजामी से बेहाल है बादल

कहीं है जंगल फांका-फांका,

कहीं भूखंड है पड़ा विरान।

असमंजस में बादल, कहीं फूट पड़ा

जन जीवन हुआ इतर-बितर।

असमय व्यवहार इसका,

हदें तोड़ दी जरूरतों की।

उभर पड़ी विस्थापना की समस्या,

बादल ये देख-देख सोच में पड़ा-

मैं अप्राकृतिक हुआ कैसे?

दोष इसमें किसका है?

मेरा या मानवों के भौतिक सुख का?

- prakash sah (©ps)





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Friday, 23 August 2019

नदी के लिए आंदोलन क्यूँ ??







नदी की जलधारा निरंतर
अपने पूरे वेग में बहती है
जब, घने वनों के छाँव से
इनके चरणस्पर्श करके
आशीष में कुछ बूंदे लेकर
सागर से मिलने जाती है।

अनेक बाधाओं को
अपने कोमल बर्ताव से
आंचल में शामिल करके
मीठे मीठे अनुभव सहेजकर
सागर के 'खारा' ज़ख्म को
थोड़ा-सा कम करने जाती है।

जीवन जो आश्रित है
उनको अपना संतान मानकर
भू-माता अपने गर्भ में
'अमृत' को संभाले रखी है।
किनारे को सागर के चोट से
'खारा' दोष से मुक्त रखने के लिए
नदी निरंतर आंदोलन करती रहती है।
 -  ©ps प्रकाश साह


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Sunday, 4 August 2019

तय कोई सफर नहीं (Tay Koi Safar Nahi) - Prakash Sah

जीवन में उतार चढ़ाव लगा रहता है...यह सत्य ही है। परिस्थितियाँ एकसमान कभी नहीं रहती है और कभी रह भी नहीं सकती है....हमें ऐसा कभी सोचना भी नहीं चाहिए। 
मुझे लगता है एक बात पर और ध्यान देना चाहिए  कि हमसब के अंदर एक ‘हनुमान’ जरूर रहतें हैं बस हमें ‘जाम्बवंत’ जैसे किसी स्मरणकर्ता की जरूरत होती है जो आपकी शक्ति को पुनर्स्मरण कराए। क्योंकि अनिच्छित परिस्थितियों के कारण हम शायद स्वयं को भूल जाते हैं। 

चलिए अब बढ़ते है रचना की ओर जो इसी विषय को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं...

Please...must watch the video is given below at the end of this post.
( मैं पहली बार  अपनी किसी रचना को अपने आवाज में रिकार्ड कर के यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। विडियो  लिखित रचना के नीचे दिया गया है.....जरूर देखें और आपसब अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाएँ भी दें )


तय कोई सफर नहीं (Tay Koi Safar Nahi) - Prakash sah - UNPREDICTABLE ANGRY BOY www.prkshsah2011.blogspot.in


।। तय कोई सफर नहीं ।।



तय कोई सफर नहीं

अगर भय कहे-

मैं तुममें हूँ

तो निश्चय है

उसका कोई घर नहीं।


तय कोई सफर नहीं...



तू देख अपने अगल-बगल

कतारबद्ध लोगों का

भीड़ चल रहा

तू वहाँ एक अकेला खड़ा है

भय से कोई मुक्त नहीं


तय कोई सफर नहीं...



केवल सुख की अगर मांग है

भय की ट्रेन लगी है तेरी

तुझे छोड़नी है, या पकड़नी है

तय तुझे करना है

सफर तुझे करना है

तय कोई सफर नहीं


तय कोई सफर नहीं...

                -  ©ps प्रकाश साह



विडियो को जरूर देखें...👇👇👇

मैं पहली बार  अपनी किसी रचना को अपने आवाज में रिकार्ड कर के यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। नीचे दिए गए विडियो को जरूर देखें और आपसब अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रियाएँ भी दें। धन्यवाद!
watch the video (use Earphone)...👇👇👇




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