अशुद्ध मन में पूजा तेरी,
लक्ष्य काे भेदा नहीं।
"अशुद्ध हुआ तेरा मन"
तुमने इसे जाना कैसे?
'शुद्धता' क्या अभी शेष है!
या, फिर यह भी तुम्हारा
काेई नया भेष है!
क्याेंकि बेवज़ह कुछ भी हाेता नहीं...
-Prakash Sah
आप सभी का इस ब्लॉग पर स्वागत है। इस ब्लॉग को लिखने का कुछ खास उद्देश्य नहीं है। एक इंसान को अपने जीवन में हर दिन कई भाव विचारों से गुजरना पड़ता है। बस इन्हीं भावों को कविताओं के माध्यम से आपसब के साथ साझा करने का मुझे यह एक उचित स्थान लगा। आप मेरे लिखे रचनाओं के माध्यम से इस ब्लॉग के नाम का सार्थक परिभाषा भी जान सकते हैं। मेरी रचनाएँ कुछ काल्पनिक हैं और कुछ वास्तविक हैं। इससे किसी के जीवन में मार्गदर्शन मिल जाये तो बस यह एक संयोग मात्र होगा। [अंतिम पंक्ति आपके चेहरे पे मुस्कान लाने के लिए था]
अशुद्ध मन में पूजा तेरी,
लक्ष्य काे भेदा नहीं।
"अशुद्ध हुआ तेरा मन"
तुमने इसे जाना कैसे?
'शुद्धता' क्या अभी शेष है!
या, फिर यह भी तुम्हारा
काेई नया भेष है!
क्याेंकि बेवज़ह कुछ भी हाेता नहीं...
-Prakash Sah
का हो, सरकार केकरा ख़ातिर होला?
इलेक्शन में कोरोना ना होला?
बेरोज़गारी में आराम बा?
इहे सवाल बा।
मजदूरी ना कौनो खराब बा!
एक बोरा आनाज देम
500 के नोट देम
तू आपन प्रतिभा कबो ना निखर बअ
तू अफसर कबो ना कौनो बन बअ
एही में तहरा के फंसा के
निम्न स्तर पर रखेम।
बेरोज़गारी में आराम बा?
अरे! इहे त सवाल बा।
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(1)
ई बार फेर बिहार पे नेपाल आशीष पड़ल बा
ऊहवें से हाहाकार मचईले बाढ़ चलल बा
साँस फुलईले खूब मुँह बावत, उ बढ़
रहल बा
खेतवाँ के हरिअर-हरिअर रंग, नीला-नीला
कर रहल बा
हर साल बिन पानी के बर्बाद फसल के असल सच
इहवें बा
अबकी दुअरा-अंगना, गंगा
मईया के पाठशाला लागल बा
(2)
पूरा गाँव भईल बा खाली, सबजन
के भईल बा दुखवा
लोग आपन पेट छोड़ के, देखत बानी मालजाल के भूखवा
गाछ-वृक्ष भईलन अकेला, बिन
बतियले एक महिना
कुछ दुलरूवा सुख गईलन, जब
देखलन लोग कहीं ना
(3)
काम-धंधा होगईल सब ठप, जमापूंजी
होगईल सब खत्म
बहुते घट गईल घटना, अब
बढ़ गईल जान के खतरा
सेवा-पुण्य में अईलन अपने गाँव-जवार के
लईका
अन्न-इंधन से चिंतामुक्त, सुतलन
सबजन के बचवा
(4)
खाली-खाली देख के खेत, निराशा
आईल बा खूब भर पेट
सब किसान के आईल बा हाथ, बस
मुआवजा मात्र रेत
केकर नीति भईल बा फेल, अब चुनाव
में नेता होईहन रेल
आपदा में नेता केतना नेक, चल बदल
के भेष खूब रोटी सेक
NOTE: कुछ शब्द के अर्थ....
हरिअर : GREEN, मालजाल : ANIMAL
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क्या कहूँ!
कहने को
बहुत कुछ है-
मुझसे
सब नाराज़ हैं,
बस...
यही कहने को है।
एक-एक कर
सब दूर
हो रहें हैं
मुझसे।
उथल-पुथल
मच गया है
जीवन में।
इसकी
वजहें
बहुत है
बस...
समझ
नहीं आ रहा...
कि
कहाँ से
और कैसे
सुलझाउँ इसे?
कि
दिल की
सुनूँ या
दिमाग की?
एक अविश्वास
का पुल
बन गया है
मन में।
और
इस कदर
इस पर
बढ़ गया हूँ...
कि
दूरियाँ,
दिल और
दिमाग तक की
बस...
आधी रह गई है।
क्या कहूँ...
कहने को
बहुत कुछ है!
मुझसे
सब
नाराज़ हैं
बस...
यही कहने को है।
©prakashsah