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Tuesday, 16 October 2018

हर कोई मौन का नाटक नहीं करता (Har koi Maun ka natak nahi karta) - ps


बस...! इतना कहूँगा बेवक़्त था तुम्हारा मौन होना.., फिर भी तुम्हें सुन लेता हूँ - हर वक़्त। मैं अधिक नहीं कहूँगा जिससे की कि मेरी कुछ अनकही बातें इंधन बनके दीपक को प्रज्वलित करते रहे....लम्बे अरसे तक।

हर कोई मौन का नाटक नहीं करता (Maun) - ps prkshsah2011.blogspot.in


।। हर कोई मौन का नाटक नहीं करता ।।


कोई फूलों से पूछे, उसका हाल कौन लेने है आता

कोई बारिश से पूछे, उसमें कौन-कौन है भीगता

दर पर आया हर फकीर, ढ़ोंगी नही होता

हर कोई मौन का नाटक नही करता


-~-

बालों से रिसते पानी के बूंदें, इतने जिद्दी क्यों होते

आकाश में लटके तारें, इतने दूर क्यों होते

कोई अजनबी, पराया से अपना बन जाता

हर कोई मौन का नाटक नही करता

-~-

पलकों के नयनों में, सपनें कौन भर जाता

सीपों के मुँह में, मोती कौन रख जाता

अपनो से मुँह मोड़, कैसे कोई हमें छोड़ जाता

हर कोई मौन का नाटक नही करता

©PS

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Tuesday, 27 March 2018

चिपको आंदोलन (Chipko Movement) -ps

...

प्रेम का जंगल बोया था हमने,
सबने  अपने जरूरतों के हिसाब से...
...इसका  इस्तमाल किया ।

इन्होने....
इसके,
बुरे हालातों में......एक आँसू न बहाया

शायद कहीं...
उन आंसूओं से
कोई प्रेम के बिजें......
.............. उग आतें ...............
...
तो हमे...
प्रेम के जंगल को
कसके लिपटकर
खड़ा ना होना पड़ता..,
फिर से
"चिपको आंदोलन" की शुरूआत को
सोचना न पड़ता ।
©PS

Saturday, 30 December 2017

कौन हो तुम (Stranger : Kaun ho Tum) - ps

हम सब अपने जीवन में जब भी कोई अनजान व्यक्ती से मिलते है तो उसी वक्त मन में कुछ सवाल घूमने लगता है और उन सवालों के जवाब के कोशिश में हम लगातार उलझे रहते हैं। फिर बार-बार मन पूछता है :


कौन हो तुम (Stranger) - ps www.prkshsah2011.blogspot.in


कौन हो तुम ?

क्या मैं तुमको जानता हूँ ?

बता दो जरा तुम...

पहचान कैसे हुई

तुमसे

मुझको ?

बता दो जरा तुम

ऐसे कैसे हुआ...

बिना जाने एक दूसरे को

मुलाकातें व बातें हो गई,

वादें-इरादें पक्के हो गएं,

साथ जीवन बिताने की भी ख़्वाहिश हो गई ।

अरे ! कौन-सी जादू किए हो तुम

बता दो जरा तुम...

कौन हो तुम?



तुम कैसे मिले थे,

याद नही !

क्षण भर में ही घूल मिल गए,

खूब हँसी-ठिठोली हो गई ।

यार...कौन हो तुम ?

राज खोलो...

किस दरबार से आए हो तुम ?

बता दो जरा तुम...

छलिए हो या राहगीर,

जो बस...

दो पल के मिलन की खातिर ही

आए हो तुम ।

बता दो जरा तुम...

यही हो ना तुम ?
यही हो ना तुम ? यही हो ना तुम ?
...
...
...

कौन हो तुम ?

क्या मैं तुमको जानता हूँ ?

बता दो जरा तुम...
©ps


follw the blog UNPREDICTABLE ANGRY BOY www.prkshsah2011.blogspot.in

Thursday, 7 December 2017

सखी : सागर की मोती (Sakhi : Sagar ki Moti) -ps

[ ‘सखी’ might be -
 two friends, or
two real sisters, or
a mother & a daughter, the situation after daughter got married ]

What happens when distance has been come between two sisters like friend and a day one friend is got emotional about their past memories that they both lived together….and  she is looking for a ray of hope. Once they met accidentally…..and then one friend is in complaining mood   : 

सखी : सागर की मोती
छूए मन को तेरी बात सखी,
हाथो को झूला कर
हर वो बात की जो हो सकी।
बुलाऊँ उस क्षण को
जिसमें तेरी खिल-खिलाहट खिल उठी,
मुझे भूलकर तू मेरे बिन कैसे जी उठी !

हमारी यादें, हमारे इरादें
मिली थी सागर के किनारें,
लगाते थे गोता हम साथ के सहारें,
चमकते सागर के मोतियों से
कब बन गए हम
धीरे-धीरे बिछड़न के दीवारें ?

कोई तो बुला दे, कोई तो सुला दे
उस बहती हवा में,
जिसे हमने कभी, उस सफर में चलाया था,
जब हम साथ चला करते थें।

किसी दिन वो हवा भी देखेगी जरूर,
किसी टेढ़ी-मेढ़ी रास्तों से निकलकर,
उसके ही तरह,
फिर से हमारी मंजिलें भी मिला करेगी ।
©ps