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Monday 5 December 2016

पूर्वांचल (Purvanchal) - P.S.

पूर्वांचल

जिसने पूर्वांचल की गोद मे खेला,
पग-पग मे देखा आस्था का मेला ।

जिसने खाई इस मिट्टी कीसौगंध,
पल-पल महसूस की इसकी सुगंध ।

जिन आत्माओं में जगी धर्मत्व की ज्ञान,
जन-जन ने माना उन महात्माओं को अपनी शान ।

आत्मज्ञान का हुआ बोध,
इस भूमी पे अवतरीत हुए, ‘महात्मा बुध्द’ ।


जब-जब संसार ने थामा इस भूमी का दामन,
तब-तब ललाईत हुएं, करने को इसकी छाओ में भ्रमण ।

पूर्वांचली वासियों के आन-बान-शान का दिवार,
सब का ये मनोरम विहार- हर आत्माओं मे शुमार ।

गुरू चाणक्य के गुर का द्वार,
राजनीत की नीतियों का संसार मे बहा बयार ।
।।
इस भूमी की प्यास बुझाती माँ गंगा,
जब सर पे माँ का आशीर्वाद,
किसी भी दुष्ट की ना होती मंशा-
ना लेते पूर्वांचली वासियों से कभी पंगा ।

पूर्वांचल की ईमान का एक ही मूलमंत्र,
सदैव कडी परिश्रम का होता है संग ।

इसकी हवाओं में हरियाली का संदेश,
हर जीव के प्रती समभाव रखने का है उपदेश ।

खेत-खलिहान ही रोज-मर्रा का काम,
धरती-माता हैं इनकी धाम ।
इसकी गोद में ही होता हर शाम,
मिठ्ठी बोल इनकी पहचान-
मगही, मैथली, अवधी,
भोजपुरी...सुनने को हर कान  ।
©ps



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