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Monday, 24 July 2017

ढूँढ़ो जीवन प्यार का (Dhundhon Jeevan Pyaar Ka) -ps

 ।। ढूँढ़ो जीवन प्यार का ।। 



ढूँढ़ो जीवन प्यार का,
हवा, पानी, धूप सूत्रधार इस जीवन का ।
जितना चाहो उतना ले लो,
हर सुख मिलेगा इस संसार का ।

राह का इकरार करो
अनजाना-सा सफर का,
अंत नहीं अभी शुरूआत है,
मिलेगी मनचाही मंजिलें,
बस इंतजार है आत्मसात का ।

बढ़ते राह में भूल हुई,
अब क्या होगा उस कार्य का,
जिसके लिए मैनें दिन-रात लगाई ?
फिर से तुम आगे बढ़ो, बढ़ना तुम्हारा काम है,
सदैव उस भूल के याद में रहना नहीं,
वो कार्य है आत्ममंथन का ।
कारण है बस इतना –
“अंत का कोई छोर नहीं,
शुरूआत का कोई भोर नहीं"

जिंदगी नाम है उस सफ़र का,
जिस सफ़र के लिए तुम जिन्दा हो ।
तुम परिन्दा हो परिन्दा !
अपने सपनों के पंख फैलाया करो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो,
फिर देखो आसमां को कैसे छूते हो...
©ps


Saturday, 3 June 2017

रेगिस्तान का पौधा (Registaan ka Paudha) -ps

पुरानी डायरी से :


।। रेगीस्तान का पौधा ।।

पहले मै फूलों के बगीचे का फूल था,

शायद अब मैं उस बगीचे का काँटा हूँ,

अब पसंद किसी को ना आता हूँ ।

माली से भी ना कभी ख्याल किया गया

कब मैं ‘रेगिस्तान का पौधा’ बन गया ।

Thursday, 1 June 2017

नन्हे बालक की अल्हड़ बातें - prakash sah

खूबसूरत वादियों के गोद में
 एक बालक


खूबसूरत वादी (Beautiful Scenery) -ps www.prkshsah2011.blogspot.in
रात के अंधेरे में से
स्वप्न जिकर उठा एक बालक,
धिरे-धिरे छँटी ये रात की काली चादर,
उभरा  एक अनजाना-सा दृश्य,
अब ये सामने  कौन-सी विशाल चादर?
छँटने के बजाए बढ़ रही सवेर के अंजोर में,
चार पहर के अलावा,अब आया कौन-सा ये नया पहर?
खूबसूरत वादी (Beautiful Scenery) -ps Rajgir Tilaiya www.prkshsah2011.blogspot.in
बड़ी आँखों से कुछ क्षण तक यूँ ही देखा,
बनकर निकला
एक खूबसूरत वादियों में का पहाड़,
दाएँ जंगल, बाएँ जंगल, अडिग पहाड़ पे चढ़ता जंगल,
इन मनमोहक दृश्यों को समेटकर, बालक का मन हुआ चंचल।

फिर से एकटक, विशाल पहाड़ को बालक ने देखा,
मन में कुछ सवाल उभरा-

Monday, 8 May 2017

मधुर स्वर (MELODIOUS VOICE) -PS

In the memory of our Gurudev Rabindranath Tagoreji on his birh anniversary (7 May).
This Poem of mine is only dedicated to him.

उनकी अनेकों खूबसूरत रचनाएँ है पर मेरी उन्हीं से उनके लिए एक छोटी रचना
Rabindranath Tagore
(7/5/1861 - 7/8/1941)
।। मधुर स्वर ।।

मधुर स्वर कान से दिल में आई,
रुधिरनस से पुरे देह में  समाई ।
रच-बस रही, मन में खो रही
प्रकृति के गोद में जैसे मन झूल रही ।

लययुक्त धीमी–धीमी मुखवचन बुलाती,
चेतना को पुरे विश्व भ्रमन करा रही ।
ना कोई सवाल–ना कोई जवाब किसी से
बस यूँ ही गीत-संगीत सुनाती जा रही ।