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Sunday, 15 May 2022

वन मेला - Prakash Sah

 

www.prkshsah2011.blogspot.in


वन मेला दिख गया, फूल-पत्तें नाच रहे थें

मैं उनके पास गया, वो सुकून बाँट रहे थें 


रूनझूण-रूनझूण आवाजें, जमीन पे ससर रहे थें

बुजुर्गों जैसे डाँटकर, सूखे पत्तें कुछ समझा रहे थें 


बादल आये थें चुपके से, मैं उलझा था वन देखने में

भर झोली लाये थें पानी, सबको नहलाकर चले गये 


जंगल से ही जीवन है, तुम मुझे क्यूँ सिमटा रहे?

शहर में मुझे शामिल करो, शहर से क्यूँ हटा रहे?

-प्रकाश साह

09052022


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🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏

BG P.C. : YourQuote.in

P. Editing : PRAKASH SAH

Saturday, 5 February 2022

अपना घर - prakash sah


www.prkshsah2011.blogspot.in


तुम्हारे इस शहर में कब तक अपने वजूद के जद्दोजहद में फंसा रहूँगा

एक दशक  बीत जाने  के बाद भी कब तक मैं यहाँ अंजान बना रहूँगा


देखते  ही  देखते  इस  शहर के कई  बागों  में  हजारों नये फूल  खिल  गये

ना जाने मुझे अपने बाग के लिए और कितने बसंत तक इंतज़ार करता रहना पड़ेगा

-प्रकाश साह

05022022


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BG P.C. : YourQuote.in

P. Editing : PRAKASH SAH

Tuesday, 1 June 2021

वज़ह का दोष | (कविता/संवाद) | ऐ वज़ह! तुम्हारे वज़ह से ही मैंने अपना इश्क का समंदर खोया है | PRAKASH SAH



वज़ह का दोष
■■■■□■■■■

 

चलो

कभी वज़ह को वज़ह मान लिया जाए

कुछ रिश्ते टूटने की,

बिन दोष दिए उन रिश्तों में पड़े दो व्यक्तियों को।

मैंने

अक्सर देखा है लोगों को

बेवज़ह की बातों में फँसकर

रिश्तों को फँसाते,

वही लोग जो कुछ पल पहले ही

साथ में खूब ठहाके मारे जा रहे थें।

दोष

बस उस वज़ह का होता है

जिसमें हम फँसकर

सालों तक अपनों से दूर हो जाते हैं।

कभी-कभी

उस वज़ह को भी ढूँढ़ना चाहिए

जिस वज़ह से उस वज़ह को हम सच मान लेते हैं।

क्योंकि

अचानक यूँ ही कोई वज़ह, वज़ह नहीं बनता,

एक 'सुलझी बेमतलब की वज़ह' का रूप

वक्त-दर-वक्त कुछ 'अनसूलझी वज़हों की तहें' ले लेती है।

                     ***



www.prkshsah2011.blogspot.in

 

ऐ वजह! तुम्हारे वज़ह से ही

मैंने अपना इश्क का समंदर खोया है

■□■□■□■□❤❤❤❤□■□■□■□■

 

ऐ वज़ह!!!

इधर आओ पास।

हाँ, मेरे पास!

देखो...

मेरे पैरों के नीचे

ये बिखरे पड़े रेत, मेरा दिल ही है।

क्या तुम इसे पहचान रही हो???

अच्छा!!

याद करो...वो दिन

जब कलकल करती नदी की धारा में

मैं अपनी प्रियतमा संग डूबकियाँ ले रहा था

तब तुमने ही

एक झूठ का भँवर बनाया था

कि मेरी प्रियतमा मुझसे प्रेम नहीं करती।

और मैं तब

हताहत होकर

अचानक

तुम्हारे बनाए गये

इस वज़ह के सवालों के

भँवर में

इतना घूमा

कि मेरा दिल टूटकर वहीं रेत बन गया।

 

ऐ वज़ह!

हाँ मैं तेरी वज़ह से ही,

मैं समन्दर तक बिखर गया।

लेकिन

तुमने एक बार भी

कोई भी

यूँ ही

उस झूठ पर

एक बनावटी सच का

मलहम लगाने को भी नहीं सोचा और

ना ही कभी कोशिश की

कि तुम मेरे

उस रेत-से हुए दिल को समेटकर

कम-से-कम

पत्थर का ही दिल बना दो

जिससे कि

जब भी मेरी प्रियतमा

इस नदी किनारे आये

तो कम-से-कम

मैं उसके कोमल एहसासों

को तो अपना बोल पाऊं।

पर तुमने ऐसा भी कुछ किया नहीं।

 

ऐ वज़ह!

क्या तुम्हें पता है कि

आज मैं तुम्हारे पास क्यूँ आया हूँ?

अगर नहीं, तो जान जाओ

क्योंकि आज मैंने देखा

तुम्हारे दुआरे

कि यही मेरा रेत-सा दिल, लहरों के साथ मिलकर

तुम्हारे घर के चौखट को ठोकर मारे जा रहा था।

उस वज़ह की सिर्फ एक 'बेचैनी' थी...

तुम्हें कुछ याद दिलाने के लिए...

जो शायद तुम भूल गयी हो

कि मैंने ही अपना इश्क का समन्दर खोया है,

तुम्हारे वज़ह से,

ऐ वज़ह!!!

 

ऐ वज़ह!!!

इधर आओ पास।

हाँ, मेरे पास!

देखो...

मेरे पैरों के नीचे

ये बिखरे पड़े रेत, मेरा दिल ही है।

 -प्रकाश साह

150521


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P. Editing : PRAKASH SAH

Sunday, 23 May 2021

बचपन की हवाएँ | Prakash Sah

www.prkshsah2011.blogspot.in

 


आज मैंने फिर से

वही बचपन की

हवाओं को महसूस किया है,

जिन्हें मैं अब

बिलकुल ही भूल चुका था।

वो खुश्बू, जो मेरे साँसों को

एक अलग साज देती थी,

उसका रोम-रोम स्पर्श

मेरे मुख पे

एक मखमली मुस्कान देती थी,

आज वही हवाएँ

मेरी खिड़कियों से

सर-सर्राती हुई

मेरे बिस्तर तक पहुँच रही है,

जो मेरे कानों को तो

एक अलग

अनसुनी

लयबद्ध संगीत दे ही रही है

और उसी क्षण

जब भी मैं

खिड़कियों से

बाहर देख रहा हूँ

तो इन हवाओं के संग

बीच-बीच में

उन मेघ शयनों का आना

जैसे आँखों पे

पलकों का

धीरे से टहरना,

मानो ये मेरे दो अर्ध-नयनों को

मिठे स्वाद दे रहे हों।

और उन मेघों से छनकर

आती वो गुनगुनी धूप

मनोहरी

मेरी आँखों में

सुकून भरी रौशनी

भर रही है।

आज

फिर से

इन हवाओं ने

मुझसे बिछुड़ चुके

उन सभी मिठे-मिठे

एहसासों को

बचपन के ख़जाने से

ढूँढ़कर

आज मेरे

थक चुके मन को सहला रही है।

 -प्रकाश साह

230521


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