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| PC : @prakashsah |
किसी ने सोचा कि
मुझ जंगल को लूट लेने से
मैं खाली हो जाऊँगा।
हाँ, खाली हो जाऊँगा कई निराशाओं से।
शायद क़ाबिल नहीं रहा
उन्हें छाँव देने में।
शायद क़ाबिल नहीं रहा
उन्हें जीवन ऊर्जा देने में।
मेरी कुछ अन्य नयी रचनाएँ....
आप सभी का इस ब्लॉग पर स्वागत है। इस ब्लॉग को लिखने का कुछ खास उद्देश्य नहीं है। एक इंसान को अपने जीवन में हर दिन कई भाव विचारों से गुजरना पड़ता है। बस इन्हीं भावों को कविताओं के माध्यम से आपसब के साथ साझा करने का मुझे यह एक उचित स्थान लगा। आप मेरे लिखे रचनाओं के माध्यम से इस ब्लॉग के नाम का सार्थक परिभाषा भी जान सकते हैं। मेरी रचनाएँ कुछ काल्पनिक हैं और कुछ वास्तविक हैं। इससे किसी के जीवन में मार्गदर्शन मिल जाये तो बस यह एक संयोग मात्र होगा। [अंतिम पंक्ति आपके चेहरे पे मुस्कान लाने के लिए था]
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| PC : @prakashsah |
किसी ने सोचा कि
मुझ जंगल को लूट लेने से
मैं खाली हो जाऊँगा।
हाँ, खाली हो जाऊँगा कई निराशाओं से।
शायद क़ाबिल नहीं रहा
उन्हें छाँव देने में।
शायद क़ाबिल नहीं रहा
उन्हें जीवन ऊर्जा देने में।
मेरी कुछ अन्य नयी रचनाएँ....
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| PC : @prakashsah |
ज़हन में जब कुछ राज़ दफन किये जाएँगे,
तो सच में शहर में बहुत कोई अपने हो जाएँगे।
लगन से जब कुछ पौधें शहरी भाषा सीख जाएँगे,
तो सच में शहर में कई बग़ीचे जंगल हो जाएँगे।
मेरी कुछ अन्य नयी रचनाएँ....
शब्दार्थ :
●जेंगऽ : जिस तरह से; ●ओहिंगऽ : उस तरह से; ●उज्जर : सफेद; ●हरिअर : हरा रंग, हरियाली; ●बेरा : समय; ●पहरिया : पहर
मैं साथ नहीं तो क्या हुआ?
मेरा विवाह तुमसे नहीं हुआ तो क्या हुआ?
मैं तुम्हारे प्रेम में हूँ, काफी है।
तुम्हारा प्रेम नहीं मिला तो क्या हुआ!
संगीत मैंने खूब सुना,
दुःख मैंने खूब रोया।
उपहारों में मैंने तुम्हें पाया,
तुम्हें अपने घर का हिस्सा बना नहीं पाया तो क्या हुआ!
तुम्हारे संग सुकून का मौसम मिला,
मेरी सारी बातों को नया आयाम मिला।
तुम्हारा नहीं तो मेरा ही सही,
नहीं मिला तुम्हारा इज़हार तो क्या हुआ!
अपने नाम के साथ तुम्हें बांध नहीं पाया,
हाँ मालूम है तुम्हें बंधना पसंद नहीं।
तुम्हारी ज़ुल्फ़ें तुम्हारी ही तरह आज़ाद है,
बस उन ज़ुल्फ़ों में खुद को उलझा नहीं पाया तो क्या हुआ!
पकड़ नहीं पाया तुम्हारी उँगली,
छू नहीं पाया तुम्हारी पलकें,
लगा नहीं पाया तुम्हारे माथे पे कोई बिन्दी,
ना जाने क्या-क्या रह गया बाक़ी।
हक से मैंने तुम्हें सब कुछ कहा,
बस कह नहीं पाया तो सिर्फ तुम्हें संगिनी।
-प्रकाश साह21062024