Email Subscription

Enter your E-mail to get
👇👇👇Notication of New Post👇👇👇

Delivered by FeedBurner

Followers

Saturday, 10 August 2024

शहर राज़दार | PRAKASH SAH

PC : @prakashsah

 


ज़हन  में  जब  कुछ राज़  दफन  किये जाएँगे,

तो सच में शहर में बहुत कोई अपने हो जाएँगे।


लगन से जब कुछ पौधें शहरी भाषा सीख जाएँगे,

तो सच में शहर में कई  बग़ीचे जंगल हो जाएँगे।


-प्रकाश साह
05042024



  

🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏

Friday, 9 August 2024

उज्जर मन | Prakash Sah | भोजपुरी कविता

 



जेंगऽ खेतिया में लहलाहे ला, लागल फसल,

ओहिंगऽ करऽ ता मन उज्जर के हरिअर करे के।



हवा बन के आईल बा केहू बरखा के,

पर नईखे आईल केहू बन के बदरी सावन के।



जे के मन चाहे ला, उ कहाँ मिलेला!

अब मिलेला खाली बरखा बेमौसम के।



जब गरजेला बादल कौनो बेरा पहरिया में,

तऽ समझऽ फाटल बा मन कहीं केहू के।



ई काहे हो ला?

ए से पहिले ठीक करे के होई आपन उज्जर मन के।

-प्रकाश साह
22062024


 

शब्दार्थ :

जेंगऽ : जिस तरह से;   ●ओहिंगऽ : उस तरह से; ●उज्जर : सफेद;  ●हरिअर : हरा रंग, हरियाली; ●बेरा : समय;  ●पहरिया : पहर




आपकाे यह रचना कैसी लगी नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बतायें। और अगर मेरे लिए आपके पास कुछ सुझाव हाे तो आप उसे मेरे साथ जरूर साझा करें।     

🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏 

 

Wednesday, 7 August 2024

संगिनी | Prakash Sah


मैं साथ नहीं तो क्या हुआ?

मेरा विवाह तुमसे नहीं हुआ तो क्या हुआ?

मैं तुम्हारे प्रेम में हूँ, काफी है।

तुम्हारा प्रेम नहीं मिला तो क्या हुआ!


संगीत मैंने खूब सुना,

दुःख मैंने खूब रोया।

उपहारों में मैंने तुम्हें पाया,

तुम्हें अपने घर का हिस्सा बना नहीं पाया तो क्या हुआ!


तुम्हारे संग सुकून का मौसम मिला,

मेरी सारी बातों को नया आयाम मिला।

तुम्हारा नहीं तो मेरा ही सही,

नहीं मिला तुम्हारा इज़हार तो क्या हुआ!


अपने नाम के साथ तुम्हें बांध नहीं पाया,

हाँ मालूम है तुम्हें बंधना पसंद नहीं।

तुम्हारी ज़ुल्फ़ें तुम्हारी ही तरह आज़ाद है,

बस उन ज़ुल्फ़ों में खुद को उलझा नहीं पाया तो क्या हुआ!


पकड़ नहीं पाया तुम्हारी उँगली,

छू नहीं पाया तुम्हारी पलकें,

लगा नहीं पाया तुम्हारे माथे पे कोई बिन्दी,

ना जाने क्या-क्या रह गया बाक़ी।

हक से मैंने तुम्हें सब कुछ कहा,

बस कह नहीं पाया तो सिर्फ तुम्हें संगिनी।


-प्रकाश साह
21062024



आपकाे यह रचना कैसी लगी नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बतायें। और अगर मेरे लिए आपके पास कुछ सुझाव हाे तो आप उसे मेरे साथ जरूर साझा करें।     

🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏 

 

Monday, 6 February 2023

बसंत के फूलों के खेत में | PRAKASH SAH

www.prkshsah2011.blogspot.in

 

पिछले  साल  गाँव  के   हमारे   सारे   खेत   विरान    थें,

कुछ  मधुएँ  मेरी   माँ   को  ये   बताने    घर  गयी   थीं।


याद है मुझे वो शादी वाला साल, जब पीले फूलों की खुश्बू थी,

आने  वाले  हर ऋतुओं  में,  तुम मुझसे  धीरे-धीरे  दूर हुई थी।


 मधुओं ने देखा है,  हमारे बीच बदलते मौसम वाले रिश्तें रहे थें,

 इसलिए मधुएँ शीतलहरी में भी सरसो के फूलों का रस लाती थीं।


और फिर जब हम मिले थें बसंत के फूलों के खेत में,

तब मधुएँ ही आयी थीं हमारे बीच सारी कड़वाहटों को दूर करने के लिए।


ता-उम्र बिगड़ते रिश्तें सुधारेंगी मधुएँ,

जब-जब उन्हें बसंत के  फूल मिलेंगे।

बस हर बार  तुम याद  से  देख लेना,

हमारे खेत बसंत  में  विरान ना मिले।

-प्रकाश साह

21012023



 मेरी कुछ अन्य नयी रचनाएँ....


आपकाे यह रचना कैसी लगी नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बतायें। और अगर मेरे लिए आपके पास कुछ सुझाव हाे तो आप उसे मेरे साथ जरूर साझा करें।     

🙏🙏 धन्यवाद!! 🙏🙏

Photo Credit : PRAKASH SAH